Kavita
हम यह आ गए
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January 1, 1970
सोच के जिस बारे में
आंखें आती थी झलक
आज उसी से लड़ रहे है हम
जिस तरह कभी भी सोचा न था
वो कुछ इस कदर कर रहे है हम
जब सब कुछ होकर भी सही
गलत से लड़ रहे है हम
पता होकर सबकुछ
न जाने किसी अनजान बन रहे है
धूप में सोते सात
छांव के राहत भूल गए है
आगे बढ़ते बढ़ते
अनमोल रत्न पीछे छुट गए
नए की चाह में न जाने कब
अपने पीछे छुट गए
जितने कि जिद में
चैन हार गए
न जाने कैसे ओर क्यों
यहां हैं आ गए
आंखें आती थी झलक
आज उसी से लड़ रहे है हम
जिस तरह कभी भी सोचा न था
वो कुछ इस कदर कर रहे है हम
जब सब कुछ होकर भी सही
गलत से लड़ रहे है हम
पता होकर सबकुछ
न जाने किसी अनजान बन रहे है
धूप में सोते सात
छांव के राहत भूल गए है
आगे बढ़ते बढ़ते
अनमोल रत्न पीछे छुट गए
नए की चाह में न जाने कब
अपने पीछे छुट गए
जितने कि जिद में
चैन हार गए
न जाने कैसे ओर क्यों
यहां हैं आ गए
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