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Explore our collection of 56 beautiful poems
Ghazal
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इंसानियत का आसरा
किसी के ज़ख़्म की कोई दवा होना चाहिए,
बुरे वक़्तों में कोई आसरा होना चाहिए।
ये जो इंसान हैं, टूटे हुए हैं अंदर से,
इन्हें छूने को लहजा नरम होना चाहिए।
जो रोता है, उसे चुप से रुला देना ही बस,
...
बुरे वक़्तों में कोई आसरा होना चाहिए।
ये जो इंसान हैं, टूटे हुए हैं अंदर से,
इन्हें छूने को लहजा नरम होना चाहिए।
जो रोता है, उसे चुप से रुला देना ही बस,
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Ghazal
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बाज़ार
यहाँ 'ज़मीर' भी 'बाज़ार' में सरे-आम बिकता है,
वो 'सच' क्या बोलेगा, जिसका 'ईमान' बिकता है।
तू 'मंदिर-मस्जिद' में 'रब' को ढूँढता है 'नादान',
वहाँ तो 'दर्शन' का 'पैकेट' भी 'ऊँचे दाम' बिकता है।
'ग...
वो 'सच' क्या बोलेगा, जिसका 'ईमान' बिकता है।
तू 'मंदिर-मस्जिद' में 'रब' को ढूँढता है 'नादान',
वहाँ तो 'दर्शन' का 'पैकेट' भी 'ऊँचे दाम' बिकता है।
'ग...
Ghazal
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मरघट का सच
जो 'माल' गिनता था, उसका 'ख़याल' जल गया।
जो 'मैं' का 'जाल' बुना था, वो 'जंजाल' जल गया।
मरघट का सच
वो 'ऊँची ज़ात' की बातें, वो 'ऊँचा' सर उसका,
चिता की आँच लगी, सब 'कमाल' जल गया।
कोई 'दुकान' पे रो...
जो 'मैं' का 'जाल' बुना था, वो 'जंजाल' जल गया।
मरघट का सच
वो 'ऊँची ज़ात' की बातें, वो 'ऊँचा' सर उसका,
चिता की आँच लगी, सब 'कमाल' जल गया।
कोई 'दुकान' पे रो...
Ghazal
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मरघट का पाखंड
जो घर पे फ़र्ज़ न अपना निभाने निकले,
वो झूठे आँसू नदी में बहाने निकले
ज़मीन बाँट चुके जो अभी से आपस में,
वही चिता पे हैं 'रिश्ते' जताने निकले।
कभी जो पूछ न पाए थे 'पानी' की क़ीमत,
वो राख पर 'घ...
वो झूठे आँसू नदी में बहाने निकले
ज़मीन बाँट चुके जो अभी से आपस में,
वही चिता पे हैं 'रिश्ते' जताने निकले।
कभी जो पूछ न पाए थे 'पानी' की क़ीमत,
वो राख पर 'घ...
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आदत
चेहरे पे चेहरा हर घड़ी चढ़ाने की आदत है।
दुनिया को झूठे ख़्वाब ही दिखाने की आदत है।
जब काम हो तो पास वो आ जाने की आदत है।
मक़सद हुआ पूरा, तो कतराने की आदत है।
महफ़िल में ऊँची हिकमतें सुनाने की...
दुनिया को झूठे ख़्वाब ही दिखाने की आदत है।
जब काम हो तो पास वो आ जाने की आदत है।
मक़सद हुआ पूरा, तो कतराने की आदत है।
महफ़िल में ऊँची हिकमतें सुनाने की...
Ghazal
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मरण
रोज साँसां की किस्तां नै भरता रहूँ,
इस जिन्दगी का कर्जा उतरता कोन्या।
घुट-घुट कै मर जाऊँ तो ठीक सै सबनै,
पर सीधी मौत पै घर राजी होता कोन्या।
पर तो दे दिए राम नै, उड़ण का हुनर भी दिया,
पर इस ग...
इस जिन्दगी का कर्जा उतरता कोन्या।
घुट-घुट कै मर जाऊँ तो ठीक सै सबनै,
पर सीधी मौत पै घर राजी होता कोन्या।
पर तो दे दिए राम नै, उड़ण का हुनर भी दिया,
पर इस ग...
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मैं इसलिए किसी को नहीं चाहता...
यहाँ हर शख़्स काग़ज़ का खिलौना चाहता है,
मैं दिल देकर यूँ क़ीमत चुकाना नहीं चाहता।
लोग पढ़ते हैं चेहरे को मतलब निकालने तक,
मैं ऐसी कोई भी महफ़िल सजाना नहीं चाहता।
वो कहते हैं कि हमदर्द हैं, पर...
मैं दिल देकर यूँ क़ीमत चुकाना नहीं चाहता।
लोग पढ़ते हैं चेहरे को मतलब निकालने तक,
मैं ऐसी कोई भी महफ़िल सजाना नहीं चाहता।
वो कहते हैं कि हमदर्द हैं, पर...
Ghazal
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हाँ मैं अहंकारी हूँ।
जब लड़ रहा था मैं अकेले ज़िन्दगी के तूफ़ानों से,
जब घिरा हुआ था मैं मतलबपरस्त इंसानों से,
मैं अपने ही ग़मों का एक अकेला व्यापारी हूँ,
अगर इसे कहते हो खुद्दारी, तो हाँ मैं अहंकारी हूँ।
तब कहाँ थे...
जब घिरा हुआ था मैं मतलबपरस्त इंसानों से,
मैं अपने ही ग़मों का एक अकेला व्यापारी हूँ,
अगर इसे कहते हो खुद्दारी, तो हाँ मैं अहंकारी हूँ।
तब कहाँ थे...
Ghazal
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सौदा नहीं किया
इसमें एक ऐसे इंसान की ज़िद है जिसने अपनी भावनाओं और उसूलों को दुनिया के लालच में बिकने नहीं दिया
लाख आए ख़रीदार, मगर सौदा नहीं किया,
हमने दिल को दिल रखा, बाज़ार नहीं होने दिया।
बिक गए लोग यहाँ, चं...
लाख आए ख़रीदार, मगर सौदा नहीं किया,
हमने दिल को दिल रखा, बाज़ार नहीं होने दिया।
बिक गए लोग यहाँ, चं...
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सौदा-ए-ज़िंदगी
इक उम्र गुज़ार दी हमने, इक नई उम्र पाने में,
अब कोसते हैं उसी वक़्त को, जो गंवाया ज़माने में।
कल के सुकून की ख़ातिर, हमने आज को गिरवी रख दिया,
पूरी जवानी फूँक दी, बुढ़ापे का बिस्तर सजाने में।
सो...
अब कोसते हैं उसी वक़्त को, जो गंवाया ज़माने में।
कल के सुकून की ख़ातिर, हमने आज को गिरवी रख दिया,
पूरी जवानी फूँक दी, बुढ़ापे का बिस्तर सजाने में।
सो...
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दर्द का कारोबार
तेरे जाने के बाद, शायरी का कारोबार चलने लग गया,
हर महफ़िल में अब, मेरे नाम का जाम चलने लग गया।
तूने सोचा था कि टूट कर बिखर जाऊँगा मैं तन्हाई में,
मगर देख, मेरे आंसुओं का ही दाम चलने लग गया।
एक फ...
हर महफ़िल में अब, मेरे नाम का जाम चलने लग गया।
तूने सोचा था कि टूट कर बिखर जाऊँगा मैं तन्हाई में,
मगर देख, मेरे आंसुओं का ही दाम चलने लग गया।
एक फ...
Ghazal
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रहम-ओ-करम
जब एक इंसान दूसरों का दर्द बाँटते-बाँटते खुद खाली हो जाता है, तो उसे सिर्फ़ ऊपर वाले की 'रहमत' की आस होती है।
उसी 'दुआ' और 'पुकार के अंदाज़ में यह शायरी पेश है
इस भरे जहान में, बस एक इनायत चाहिए,
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उसी 'दुआ' और 'पुकार के अंदाज़ में यह शायरी पेश है
इस भरे जहान में, बस एक इनायत चाहिए,
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