Nazm
अपूर्ण हो तुम
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December 12, 2025
कान्हा, भ्रम में मत रहना...
कि तुम 'पूर्ण' हो।
ज़रा अपने नाम के आगे से मेरा नाम हटाकर तो देखो,
तुम 'राधा-कृष्ण' से घटकर... महज़ एक 'किस्सा' रह जाओगे।
संसार तुम्हें 'ईश्वर' कहता है,
पर भूलना मत...
उस ईश्वर को भी 'इंसान' बनकर रोने पर,
सिर्फ़ मेरे प्रेम ने मजबूर किया है।
तुम्हारी बांसुरी की धुन पर दुनिया नाचती होगी,
पर वह बांसुरी भी,
सिर्फ़ मेरी साँसों की मोहताज है।
मैं रुकूँ... तो तुम बेसुध,
मैं चलूँ... तो तुम अस्तित्व में।
यह मेरा अहंकार नहीं, नियति का व्यंग्य है
कि सबको 'तारने' वाले को,
खुद को 'संभालने' के लिए मेरी ज़रूरत पड़ती है।
तो यह गाँठ बाँध लो अपने पीतांबर में...
तुम मुझसे नहीं, मैं तुमसे नहीं...
बल्कि 'मैं' हूँ, तभी तुम 'तुम' हो
वरना मेरे बिना...
तुम उस मंदिर की मूर्ति हो,
जिसमें प्राण तो हैं, पर धड़कन नहीं।
हक़ है मेरा, इसलिए कहती हूँ—
तुम सिर्फ़ मेरे हो,
क्योंकि मुझे छोड़कर, तुम खुदा तो हो सकते हो...
पर 'कान्हा' नहीं हो सकते।
कि तुम 'पूर्ण' हो।
ज़रा अपने नाम के आगे से मेरा नाम हटाकर तो देखो,
तुम 'राधा-कृष्ण' से घटकर... महज़ एक 'किस्सा' रह जाओगे।
संसार तुम्हें 'ईश्वर' कहता है,
पर भूलना मत...
उस ईश्वर को भी 'इंसान' बनकर रोने पर,
सिर्फ़ मेरे प्रेम ने मजबूर किया है।
तुम्हारी बांसुरी की धुन पर दुनिया नाचती होगी,
पर वह बांसुरी भी,
सिर्फ़ मेरी साँसों की मोहताज है।
मैं रुकूँ... तो तुम बेसुध,
मैं चलूँ... तो तुम अस्तित्व में।
यह मेरा अहंकार नहीं, नियति का व्यंग्य है
कि सबको 'तारने' वाले को,
खुद को 'संभालने' के लिए मेरी ज़रूरत पड़ती है।
तो यह गाँठ बाँध लो अपने पीतांबर में...
तुम मुझसे नहीं, मैं तुमसे नहीं...
बल्कि 'मैं' हूँ, तभी तुम 'तुम' हो
वरना मेरे बिना...
तुम उस मंदिर की मूर्ति हो,
जिसमें प्राण तो हैं, पर धड़कन नहीं।
हक़ है मेरा, इसलिए कहती हूँ—
तुम सिर्फ़ मेरे हो,
क्योंकि मुझे छोड़कर, तुम खुदा तो हो सकते हो...
पर 'कान्हा' नहीं हो सकते।
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ये कैसा 'कोहरा' है जो अब छंटता नहीं,
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
तो... आ ही गए।
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमद...
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमद...
सुनो शहर...
अब अपने इन ऊँचे मकानों की खिड़कियाँ बंद कर लो,
क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता थ...
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क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता थ...