Ghazal

आखिर कौन हो तुम?

16 views December 16, 2025
मेरे दिल में गूँजता हुआ, एक सवाल हो तुम,
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है तुमसे,
कभी लगता है कि बिल्कुल ही, अनजान हो तुम।
मेरे सूने से दिल में मचा, एक बवाल हो तुम।

पढ़ तो लिया है मैंने हर पन्ने पर तुम्हें,
जो समझ में न आए, वो मुश्किल किताब हो तुम।
जो फँसा ले अपनी मासूमियत में, वो जाल हो तुम।
कभी मरहम की तरह, कभी ज़ख्म की तरह मिलते हो,
बता दो आज, मेरा सुकून हो या मेरा हाल हो तुम।

छुपा रखा है खुद को इन रहस्यों की चादर में,
ज़रा पर्दा हटाओ चेहरे से... आखिर कौन हो तुम?

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