Ghazal
आखिर कौन हो तुम?
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December 16, 2025
मेरे दिल में गूँजता हुआ, एक सवाल हो तुम,
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है तुमसे,
कभी लगता है कि बिल्कुल ही, अनजान हो तुम।
मेरे सूने से दिल में मचा, एक बवाल हो तुम।
पढ़ तो लिया है मैंने हर पन्ने पर तुम्हें,
जो समझ में न आए, वो मुश्किल किताब हो तुम।
जो फँसा ले अपनी मासूमियत में, वो जाल हो तुम।
कभी मरहम की तरह, कभी ज़ख्म की तरह मिलते हो,
बता दो आज, मेरा सुकून हो या मेरा हाल हो तुम।
छुपा रखा है खुद को इन रहस्यों की चादर में,
ज़रा पर्दा हटाओ चेहरे से... आखिर कौन हो तुम?
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है तुमसे,
कभी लगता है कि बिल्कुल ही, अनजान हो तुम।
मेरे सूने से दिल में मचा, एक बवाल हो तुम।
पढ़ तो लिया है मैंने हर पन्ने पर तुम्हें,
जो समझ में न आए, वो मुश्किल किताब हो तुम।
जो फँसा ले अपनी मासूमियत में, वो जाल हो तुम।
कभी मरहम की तरह, कभी ज़ख्म की तरह मिलते हो,
बता दो आज, मेरा सुकून हो या मेरा हाल हो तुम।
छुपा रखा है खुद को इन रहस्यों की चादर में,
ज़रा पर्दा हटाओ चेहरे से... आखिर कौन हो तुम?
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हुनर लफ़्ज़ों का बाज़ार में बिक सकता है बेशक,
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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ये वो दौलत है जो रूह के जल...
लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
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