Ghazal
क़ब्रिस्तान
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December 12, 2025
तुम्हें आबादी मुबारक, मैं वीराने में रहता हूँ,
जहाँ मुर्दे सुलगते हैं, मैं उस शमशाने में रहता हूँ।
तुम्हें मख़मल के बिस्तर की ज़रूरत होगी,
मैं जहाँ हड्डियाँ गलती हैं, उस तहख़ाने में रहता हूँ।
वो खोपड़ी, कफ़न और रूहें मेरे साथी हैं,
मैं क़ब्रिस्तान के हर इक अफ़साने में रहता हूँ।
डराता है जिसे ये शहर पूरा, वो मेरा घर है,
मैं सन्नाटों के उस पुराने ठिकाने में रहता हूँ।
ज़माना ढूँढता है ज़िंदगी को हर तरफ़,
मैं मौत के ही इक कारख़ाने में रहता हूँ।
जहाँ मुर्दे सुलगते हैं, मैं उस शमशाने में रहता हूँ।
तुम्हें मख़मल के बिस्तर की ज़रूरत होगी,
मैं जहाँ हड्डियाँ गलती हैं, उस तहख़ाने में रहता हूँ।
वो खोपड़ी, कफ़न और रूहें मेरे साथी हैं,
मैं क़ब्रिस्तान के हर इक अफ़साने में रहता हूँ।
डराता है जिसे ये शहर पूरा, वो मेरा घर है,
मैं सन्नाटों के उस पुराने ठिकाने में रहता हूँ।
ज़माना ढूँढता है ज़िंदगी को हर तरफ़,
मैं मौत के ही इक कारख़ाने में रहता हूँ।
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