Ghazal
गुज़रा ज़माना
15 views
December 12, 2025
आज बैठिये, शुक्रिया महफ़िल में आने में,
जाम पीजिये और चले जाइये गुज़रे ज़माने में।
वो जो कभी इंतेज़ार में रहती थी तुम्हारे,
अब किसी और का वक़्त पूछती है घर आने में।
तुम्हें गुरूर था अपने हुनर पे बहुत,
उसे देर ना लगी तुम्हें दिल से गिराने में।
फिसल गई रेत मुट्ठी से, तुम्हें इल्म भी न हुआ,
तुम मशगूल थे बस नए ख़्वाब सजाने में।
हम तो वहीं खड़े रहे, जहाँ तुमने छोड़ा था,
तुम ही को देर हो गई वापस बुलाने में।
जाम पीजिये और चले जाइये गुज़रे ज़माने में।
वो जो कभी इंतेज़ार में रहती थी तुम्हारे,
अब किसी और का वक़्त पूछती है घर आने में।
तुम्हें गुरूर था अपने हुनर पे बहुत,
उसे देर ना लगी तुम्हें दिल से गिराने में।
फिसल गई रेत मुट्ठी से, तुम्हें इल्म भी न हुआ,
तुम मशगूल थे बस नए ख़्वाब सजाने में।
हम तो वहीं खड़े रहे, जहाँ तुमने छोड़ा था,
तुम ही को देर हो गई वापस बुलाने में।
Share This Poem
More from Ghazal
हुनर लफ़्ज़ों का बाज़ार में बिक सकता है बेशक,
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मेरे दिल में गूँजता हुआ, एक सवाल हो तुम,
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...