Ghazal
चेहरे पे नक़ाब
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January 1, 1970
यहाँ हर शख्स अपने फ़ायदे का हिसाब रखता है,
हाथ मिलाता है मगर, चेहरे पे नक़ाब रखता है।
काँटों से बचकर चलने की हिदायत वही देता है,
जो अपनी मुट्ठी में मसले हुए गुलाब रखता है।
मेरी ख़ामोशी को मेरी हार मत समझ लेना,
वक़्त आने पर ये बंदा मुँह-तोड़ जवाब रखता है।
वो पूछता है मुझसे सबब मेरी उदासी का,
जो शख्स खुद झूठ की पूरी किताब रखता है।
नींदें बेच दी हैं मैंने अपनी ज़िम्मेदारियों के लिए,
ये और बात है कि ज़माना आँखों में ख्वाब रखता है।
हाथ मिलाता है मगर, चेहरे पे नक़ाब रखता है।
काँटों से बचकर चलने की हिदायत वही देता है,
जो अपनी मुट्ठी में मसले हुए गुलाब रखता है।
मेरी ख़ामोशी को मेरी हार मत समझ लेना,
वक़्त आने पर ये बंदा मुँह-तोड़ जवाब रखता है।
वो पूछता है मुझसे सबब मेरी उदासी का,
जो शख्स खुद झूठ की पूरी किताब रखता है।
नींदें बेच दी हैं मैंने अपनी ज़िम्मेदारियों के लिए,
ये और बात है कि ज़माना आँखों में ख्वाब रखता है।
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ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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