Ghazal
जाम और यादें 🍷
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December 12, 2025
हर रोज़ ज़हर के घूँट पीकर, मैं रोज़ मरता हूँ,
ख़बर न लग जाए किसी को, इसलिए आहिस्ता चलता हूँ।
किसी की याद ने पिछले चौराहे पे बोतल खुलवा दी,
अब उस रास्ते से गुज़रता हूँ, तो बस फिसलता हूँ।
नशा तो महज़ एक बहाना है अश्क़ छुपाने का,
हँसता हूँ महफ़िल में, मगर अंदर ही अंदर जलता हूँ।
लड़खड़ाते क़दमों से नाप लेता हूँ तन्हाई सारी,
गिरता हूँ ख़ुद ही, और ख़ुद ही संभलता हूँ।
वो पूछते हैं, "किसके ग़म में डूबे हो ज़िगर'?"
मैं नाम उसका लबों तक लाकर, बात बदलता हूँ।
मै हर रोज़ ज़हर के घूँट पीकर, रोज़ मरता हूँ,
ख़बर न लग जाए किसी को, इसलिए आहिस्ता चलता हूँ।
किसी की याद ने पिछले चौराहे पे बोतल खुलवा दी,
अब उस रास्ते से गुज़रता हूँ, तो बस फिसलता हूँ।
नशा तो महज़ एक बहाना है अश्क़ छुपाने का,
हँसता हूँ महफ़िल में, मगर अंदर ही अंदर जलता हूँ।
लड़खड़ाते क़दमों से नाप लेता हूँ तन्हाई सारी,
गिरता हूँ ख़ुद ही, और ख़ुद ही संभलता हूँ।
वो पूछते हैं, "किसके ग़म में डूबे हो ज़िगर'?"
मैं नाम उसका लबों तक लाकर, बात बदलता हूँ।
मै हर रोज़ ज़हर के घूँट पीकर, रोज़ मरता हूँ,
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ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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