Ghazal

दर्द का कोई बाज़ार नहीं

13 views December 17, 2025
हुनर लफ़्ज़ों का बाज़ार में बिक सकता है बेशक,
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जलने से मिलती है,
शायर कभी साँचे में ढल कर तैयार नहीं होता।
कलम घिसने से अगर कोई 'ग़ालिब' बन पाता,
तो हर चौराहे पर शायरी का खरीददार नहीं होता।
बहुत महँगी पड़ती है ये 'वाह-वाह' की लत यारो,
जब तक घर न उजड़े, ग़ज़ल का शृंगार नहीं होता।
लोग समझते हैं कि हम लफ्ज़ों से खेलते हैं,
उन्हें क्या पता कि जनाज़ों का कोई त्योहार नहीं होता।
जिन्हें चुनता है खुदा सिर्फ़ जलने के लिए ज़िगर,
ये वो नशा है जिसका कोई कारोबार नहीं होता।

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