Ghazal

पेग

15 views December 12, 2025
सुकून तो मिलता है महफ़िलें जमाने में,
मगर अकेले पीता है वीडियो कॉल पे इस ज़माने में।
दिल तो जलता है उसकी गैर-हाज़िरी से,
आग लगे तेरी यादों को, हम तो पीते हैं सर्दी भगाने में।

दिन की थकान, ऑफ़िस की सब टेंशन भूल कर,
मज़ा तो आता है रोज़ रोज़ पेग बनाने में।

दोस्त कहते हैं, "भाई, बस कर, लीवर सड़ जाएगा",
क्या रखा है इन नादानों को समझाने में।

वो बर्फ़ भी कमबख़्त पिघलती नहीं जल्दी,
उसे भी शर्म आती है शायद पैमाने में।

मुकेश यारा अब होश में आ, सुबह काम पे भी जाना है,
क्या रखा है रात भर ग़ज़लें सुनाने में!

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