Ghazal
बाज़ार
13 views
December 12, 2025
यहाँ 'ज़मीर' भी 'बाज़ार' में सरे-आम बिकता है,
वो 'सच' क्या बोलेगा, जिसका 'ईमान' बिकता है।
तू 'मंदिर-मस्जिद' में 'रब' को ढूँढता है 'नादान',
वहाँ तो 'दर्शन' का 'पैकेट' भी 'ऊँचे दाम' बिकता है।
'गवाह' 'वक़ील' 'कलम' सब 'ख़रीद' लेती है 'ताक़त',
यहाँ 'इंसाफ़' 'अदालत' में 'सुबह-शाम' बिकता है।
वो 'भूखे' 'नंगों' की 'तस्वीरें' छाप कर 'साहब',
'अख़बार' में 'ग़रीबी' का 'दर्द-ए-आम' बिकता है।
ये 'नफ़रतों' का 'कारोबार' कौन करता है?
यहाँ 'सियासत' के 'बाज़ारों' में 'भगवान' बिकता है।
वो 'सच' क्या बोलेगा, जिसका 'ईमान' बिकता है।
तू 'मंदिर-मस्जिद' में 'रब' को ढूँढता है 'नादान',
वहाँ तो 'दर्शन' का 'पैकेट' भी 'ऊँचे दाम' बिकता है।
'गवाह' 'वक़ील' 'कलम' सब 'ख़रीद' लेती है 'ताक़त',
यहाँ 'इंसाफ़' 'अदालत' में 'सुबह-शाम' बिकता है।
वो 'भूखे' 'नंगों' की 'तस्वीरें' छाप कर 'साहब',
'अख़बार' में 'ग़रीबी' का 'दर्द-ए-आम' बिकता है।
ये 'नफ़रतों' का 'कारोबार' कौन करता है?
यहाँ 'सियासत' के 'बाज़ारों' में 'भगवान' बिकता है।
Share This Poem
More from Ghazal
हुनर लफ़्ज़ों का बाज़ार में बिक सकता है बेशक,
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
मगर एहसास का दुनिया में कोई बाज़ार नहीं होता।
ये वो दौलत है जो रूह के जल...
लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों म...
मेरे दिल में गूँजता हुआ, एक सवाल हो तुम,
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...
हकीकत हो मेरी, या सिर्फ एक खयाल हो तुम।
कभी लगता है कि सदियों पुरानी पहचान है...