Ghazal

मिट्टी का वजूद

17 views December 14, 2025
उम्र गुज़ार दी हमने मकान सजाने में,
वक़्त ही न मिला खुद को बसाने में।

पेट की भूख ने ये कैसा हुनर सिखा दिया,
खिलौना बन गया इंसान रोटी कमाने में।

वो शख्स जो कहता था मेरा कद है आसमान जैसा,
ढेर मिट्टी का लगा देखा शमशान में।

जनाज़े में भीड़ देख कर गुमान मत करना,
लोग अपने गुनाह बख्शवाने आए हैं दफ़नाने में।

ए 'मुसाफिर' तू क्यों डरता है मौत के नाम से,
बस एक नींद की ही तो देरी है घर जाने में।

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