Ghazal
मरघट का पाखंड
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December 12, 2025
जो घर पे फ़र्ज़ न अपना निभाने निकले,
वो झूठे आँसू नदी में बहाने निकले
ज़मीन बाँट चुके जो अभी से आपस में,
वही चिता पे हैं 'रिश्ते' जताने निकले।
कभी जो पूछ न पाए थे 'पानी' की क़ीमत,
वो राख पर 'घी' के कनस्तर लुटाने निकले।
जला के आए अभी जिस्म जिसका, घर आकर,
उसी की चीज़ों पे हक़ हैं जमाने निकले।
गुरूर जिनका ज़मीं पर क़दम नहीं रखता,
वो राख बन के हवा में ठिकाने निकले।
ये मरघट देख के दो पल तो सब 'उदास' हुए,
फिर अगले रोज़ से 'दौलत' कमाने निकले।
वो झूठे आँसू नदी में बहाने निकले
ज़मीन बाँट चुके जो अभी से आपस में,
वही चिता पे हैं 'रिश्ते' जताने निकले।
कभी जो पूछ न पाए थे 'पानी' की क़ीमत,
वो राख पर 'घी' के कनस्तर लुटाने निकले।
जला के आए अभी जिस्म जिसका, घर आकर,
उसी की चीज़ों पे हक़ हैं जमाने निकले।
गुरूर जिनका ज़मीं पर क़दम नहीं रखता,
वो राख बन के हवा में ठिकाने निकले।
ये मरघट देख के दो पल तो सब 'उदास' हुए,
फिर अगले रोज़ से 'दौलत' कमाने निकले।
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