Ghazal
मरघट का सच
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December 12, 2025
जो 'माल' गिनता था, उसका 'ख़याल' जल गया।
जो 'मैं' का 'जाल' बुना था, वो 'जंजाल' जल गया।
मरघट का सच
वो 'ऊँची ज़ात' की बातें, वो 'ऊँचा' सर उसका,
चिता की आँच लगी, सब 'कमाल' जल गया।
कोई 'दुकान' पे रोया, कोई 'तिजोरी' पर,
वहाँ पे 'जिस्म' जला, घर में 'माल' बँट गया।
वो गोरा 'रंग', वो 'ताक़त', वो 'रुतबा' सब ढल गया,
जो 'कल' था, वो तो बस 'बीता-सा-हाल' जल गया।
जलाने वाले भी 'सौदे' की बात करते थे,
वहाँ 'अहमियत' का हर एक 'सवाल' जल गया।
जो 'मैं' का 'जाल' बुना था, वो 'जंजाल' जल गया।
मरघट का सच
वो 'ऊँची ज़ात' की बातें, वो 'ऊँचा' सर उसका,
चिता की आँच लगी, सब 'कमाल' जल गया।
कोई 'दुकान' पे रोया, कोई 'तिजोरी' पर,
वहाँ पे 'जिस्म' जला, घर में 'माल' बँट गया।
वो गोरा 'रंग', वो 'ताक़त', वो 'रुतबा' सब ढल गया,
जो 'कल' था, वो तो बस 'बीता-सा-हाल' जल गया।
जलाने वाले भी 'सौदे' की बात करते थे,
वहाँ 'अहमियत' का हर एक 'सवाल' जल गया।
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