Ghazal

मरण

21 views December 12, 2025
रोज साँसां की किस्तां नै भरता रहूँ,
इस जिन्दगी का कर्जा उतरता कोन्या।

घुट-घुट कै मर जाऊँ तो ठीक सै सबनै,
पर सीधी मौत पै घर राजी होता कोन्या।

पर तो दे दिए राम नै, उड़ण का हुनर भी दिया,
पर इस गरीबी का पिंजरा यो खुलता कोन्या।

सबकी भरी झोली देख कै जी जलै सै मेरा,
मेरी खाली हथेली पै कुछ भी टिकता कोन्या।

कहवैं हैं ऊपर आला सब देखै सै,
फेर मेरै आँसुआं नै वो क्यूँ पोंछता कोन्या?

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