Ghazal
मैं इसलिए किसी को नहीं चाहता...
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December 12, 2025
यहाँ हर शख़्स काग़ज़ का खिलौना चाहता है,
मैं दिल देकर यूँ क़ीमत चुकाना नहीं चाहता।
लोग पढ़ते हैं चेहरे को मतलब निकालने तक,
मैं ऐसी कोई भी महफ़िल सजाना नहीं चाहता।
वो कहते हैं कि हमदर्द हैं, पर घाव कुरेदते हैं,
मैं ज़ख़्म अब किसी को भी दिखाना नहीं चाहता।
बड़ी आसानी से वादे हवा में घोलते हैं,
मैं उस हवा पे कोई घर बनाना नहीं चाहता।
यहाँ वफ़ा की उम्मीद रेत में पानी ढूँढ़ना है,
मैं जान-बूझकर ये प्यास बढ़ाना नहीं चाहता।
बदल जाते हैं मौसम की तरह यहाँ अपने,
मैं ऐसा कोई भी रिश्ता निभाना नहीं चाहता।
ये जो तन्हाई है, सौ गुना बेहतर है उस भीड़ से,
मैं इस सुकून से बाहर अब आना नहीं चाहता।
मैं दिल देकर यूँ क़ीमत चुकाना नहीं चाहता।
लोग पढ़ते हैं चेहरे को मतलब निकालने तक,
मैं ऐसी कोई भी महफ़िल सजाना नहीं चाहता।
वो कहते हैं कि हमदर्द हैं, पर घाव कुरेदते हैं,
मैं ज़ख़्म अब किसी को भी दिखाना नहीं चाहता।
बड़ी आसानी से वादे हवा में घोलते हैं,
मैं उस हवा पे कोई घर बनाना नहीं चाहता।
यहाँ वफ़ा की उम्मीद रेत में पानी ढूँढ़ना है,
मैं जान-बूझकर ये प्यास बढ़ाना नहीं चाहता।
बदल जाते हैं मौसम की तरह यहाँ अपने,
मैं ऐसा कोई भी रिश्ता निभाना नहीं चाहता।
ये जो तन्हाई है, सौ गुना बेहतर है उस भीड़ से,
मैं इस सुकून से बाहर अब आना नहीं चाहता।
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ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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