Ghazal
मैं वो सूरज
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December 12, 2025
खैरात में मिली हुई रौशनी, मुझे अंधी कर देती है,
मैं वो सूरज हूँ, जो किसी और के अम्बर से उगा नहीं।
तुझे गुमान है कि तेरी लहरें मुझे डुबो देंगी?
मैं वो जज़ीरा (जमीन) हूँ, जो समंदर से कभी छुपा नहीं।
मेरी गर्दन को नापने का हुनर, तलवारें भूल गईं,
मेरा सर कट तो गया, मगर किसी के आगे झुका नहीं।
मेरी पहचान मेरे ज़ख्मों से है, मेरे लिबास से नहीं,
मैं वो आईना हूँ, जो पत्थर को देखकर मुड़ा नहीं।
भीड़ में चलकर मुझे, मेरा कद छोटा नहीं करना,
मैं वो रास्ता हूँ, जो किसी कारवां से जुड़ा नहीं।
लोग ढूँढते हैं मुझे, दूसरों के बनाए हुए नक्शों पर,
ज़िगर शायर वो मंज़िल है, जिसका पता किसी किताब में लिखा नहीं।
मैं वो सूरज हूँ, जो किसी और के अम्बर से उगा नहीं।
तुझे गुमान है कि तेरी लहरें मुझे डुबो देंगी?
मैं वो जज़ीरा (जमीन) हूँ, जो समंदर से कभी छुपा नहीं।
मेरी गर्दन को नापने का हुनर, तलवारें भूल गईं,
मेरा सर कट तो गया, मगर किसी के आगे झुका नहीं।
मेरी पहचान मेरे ज़ख्मों से है, मेरे लिबास से नहीं,
मैं वो आईना हूँ, जो पत्थर को देखकर मुड़ा नहीं।
भीड़ में चलकर मुझे, मेरा कद छोटा नहीं करना,
मैं वो रास्ता हूँ, जो किसी कारवां से जुड़ा नहीं।
लोग ढूँढते हैं मुझे, दूसरों के बनाए हुए नक्शों पर,
ज़िगर शायर वो मंज़िल है, जिसका पता किसी किताब में लिखा नहीं।
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ये वो दौलत है जो रूह के जल...
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