Ghazal
रहम-ओ-करम
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December 12, 2025
जब एक इंसान दूसरों का दर्द बाँटते-बाँटते खुद खाली हो जाता है, तो उसे सिर्फ़ ऊपर वाले की 'रहमत' की आस होती है।
उसी 'दुआ' और 'पुकार के अंदाज़ में यह शायरी पेश है
इस भरे जहान में, बस एक इनायत चाहिए,
इक रहम-दिल को, खुदा की रहमत चाहिए।
बाँटता रहा हूँ उम्र भर, मैं खुशियाँ गैरों को,
अब मेरे ज़ख्मों को भी, थोड़ी राहत चाहिए।
बहुत जला लिया खुद को, दूसरों के चिराग़ जलाते हुए,
मुझे अब तेरे साये की, ठंडी छत चाहिए।
थक गया हूँ मैं दुनिया के पत्थर के उसूलों से,
मेरी रूह को अब तेरी पनाह में, हिफ़ाज़त चाहिए।
नहीं माँगता मैं दौलत, न शोहरत, न तख्त-ओ-ताज,
मुझे तो बस सजदे में झुकने की, इजाज़त चाहिए।
ज़िगर ने बहुत कर लिया सबर इम्तिहानों का,
अब तो बस मेरे मालिक, तेरी शफ़क़त चाहिए।
उसी 'दुआ' और 'पुकार के अंदाज़ में यह शायरी पेश है
इस भरे जहान में, बस एक इनायत चाहिए,
इक रहम-दिल को, खुदा की रहमत चाहिए।
बाँटता रहा हूँ उम्र भर, मैं खुशियाँ गैरों को,
अब मेरे ज़ख्मों को भी, थोड़ी राहत चाहिए।
बहुत जला लिया खुद को, दूसरों के चिराग़ जलाते हुए,
मुझे अब तेरे साये की, ठंडी छत चाहिए।
थक गया हूँ मैं दुनिया के पत्थर के उसूलों से,
मेरी रूह को अब तेरी पनाह में, हिफ़ाज़त चाहिए।
नहीं माँगता मैं दौलत, न शोहरत, न तख्त-ओ-ताज,
मुझे तो बस सजदे में झुकने की, इजाज़त चाहिए।
ज़िगर ने बहुत कर लिया सबर इम्तिहानों का,
अब तो बस मेरे मालिक, तेरी शफ़क़त चाहिए।
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