Nazm
वापसी
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December 12, 2025
सुनो शहर...
अब अपने इन ऊँचे मकानों की खिड़कियाँ बंद कर लो,
क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता था,
आज अपना कलम तोड़कर जा रहा है।
बहुत जी लिया इन पत्थरों के बीच,
यहाँ भीड़ तो बेशुमार है, मगर कोई 'अपना' नहीं।
तुम्हारी इन रोशनियों ने मेरी आँखों को चुंधिया दिया है,
मुझे अब वह अंधेरा चाहिए,
जिसमें मेरे गाँव के जुगनू और तारे दिखाई देते हों।
मैं थक गया हूँ...
तुम्हारे इन पक्के फर्शों पर चलते-चलते,
मेरे पाँव अब उस 'कच्ची मिट्टी' का स्पर्श माँगते हैं।
वही मिट्टी, जिससे मेरा वजूद बना है,
और जिसे आख़िरकार मुझे अपने आगोश में लेना है।
मैं अपनी सारी ग़ज़लें, सारी वाह-वाही,
और यह झूठी मुस्कुराहटें,
यहीं तुम्हारे चौराहों पर छोड़कर जा रहा हूँ।
गाँव जा रहा हूँ...
वहाँ कोई मुशायरा नहीं सजेगा अब,
बस पुराने नीम के पेड़ के नीचे एक खाट बिछेगी,
और ख़ामोशी से बातें होंगी।
सुना है, मेरे पुश्तैनी घर की दीवारें,
मेरा इंतज़ार करते-करते बूढ़ी हो गई हैं।
उससे पहले कि मेरी साँसें टूटें,
मुझे उस आँगन की धूल को माथे से लगाना है।
शहर ने मुझे 'नाम' दिया, माना...
पर गाँव मुझे मेरा 'सुकून' लौटा देगा।
अब बस एक ही ख़्वाहिश है—
कि जब मेरी आँखें हमेशा के लिए बंद हों,
तो मेरे कानों में गाड़ियों का शोर नहीं,
बल्कि मेरे गाँव की हवाओं की सरसराहट हो।
अलविदा ए शहर...
मुसाफिर अब अपने घर लौट रहा है,
जीने के लिए नहीं...
बल्कि चैन से मरने के लिए।
अब अपने इन ऊँचे मकानों की खिड़कियाँ बंद कर लो,
क्योंकि वह 'शायर',
जो तुम्हारी सड़कों पर लफ़्ज़ ढूंढता फिरता था,
आज अपना कलम तोड़कर जा रहा है।
बहुत जी लिया इन पत्थरों के बीच,
यहाँ भीड़ तो बेशुमार है, मगर कोई 'अपना' नहीं।
तुम्हारी इन रोशनियों ने मेरी आँखों को चुंधिया दिया है,
मुझे अब वह अंधेरा चाहिए,
जिसमें मेरे गाँव के जुगनू और तारे दिखाई देते हों।
मैं थक गया हूँ...
तुम्हारे इन पक्के फर्शों पर चलते-चलते,
मेरे पाँव अब उस 'कच्ची मिट्टी' का स्पर्श माँगते हैं।
वही मिट्टी, जिससे मेरा वजूद बना है,
और जिसे आख़िरकार मुझे अपने आगोश में लेना है।
मैं अपनी सारी ग़ज़लें, सारी वाह-वाही,
और यह झूठी मुस्कुराहटें,
यहीं तुम्हारे चौराहों पर छोड़कर जा रहा हूँ।
गाँव जा रहा हूँ...
वहाँ कोई मुशायरा नहीं सजेगा अब,
बस पुराने नीम के पेड़ के नीचे एक खाट बिछेगी,
और ख़ामोशी से बातें होंगी।
सुना है, मेरे पुश्तैनी घर की दीवारें,
मेरा इंतज़ार करते-करते बूढ़ी हो गई हैं।
उससे पहले कि मेरी साँसें टूटें,
मुझे उस आँगन की धूल को माथे से लगाना है।
शहर ने मुझे 'नाम' दिया, माना...
पर गाँव मुझे मेरा 'सुकून' लौटा देगा।
अब बस एक ही ख़्वाहिश है—
कि जब मेरी आँखें हमेशा के लिए बंद हों,
तो मेरे कानों में गाड़ियों का शोर नहीं,
बल्कि मेरे गाँव की हवाओं की सरसराहट हो।
अलविदा ए शहर...
मुसाफिर अब अपने घर लौट रहा है,
जीने के लिए नहीं...
बल्कि चैन से मरने के लिए।
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ये कैसा 'कोहरा' है जो अब छंटता नहीं,
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
सूरज भी अब इस शहर में निकलता नहीं।
हवाओं में यह कैसी ज़हर की मिलावट है,
साँस लेन...
तो... आ ही गए।
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमद...
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमद...