Ghazal
वैरागी की प्रेम-कथा
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January 1, 1970
तुम्हें क्या लगता है,
आसान था एक 'योगी' से प्रेम करना?
वो, जो अपनी ही धुन में,
संसार से कटा हुआ,
बर्फ की चट्टानों पर बैठा था...
आँखें मूंदे, दुनिया से बेखबर।
सबने कहा— "वो वैरागी है,
उसके पास देने को कुछ नहीं...
न महल, न गहने, न रेशमी वस्त्र।
सिर्फ भस्म है, और श्मशान की राख।"
मगर मैंने...
मैंने उस राख में अपना 'सिंदूर' देखा।
जब दुनिया उसके गले के नाग देखकर डरती थी,
मुझे उस खौफनाक रूप में भी,
एक 'भोलापन' नज़र आता था।
मैंने इंतेज़ार किया...
सिर्फ एक जनम नहीं,
सदियों तक इंतेज़ार किया,
कि कब वो अपनी समाधि तोड़ेगा,
और कब मेरी तपस्या उसकी वैराग्य को पिघलाएगी।
और जब उसने आँखें खोलीं...
तो उसने मुझे कोई सिंहासन नहीं दिया,
उसने मुझे वो दिया, जो आज तक किसी प्रेमी ने नहीं दिया।
उसने मुझे अपना 'आधा शरीर' दे दिया।
उसने मुझे अपने वजूद में इस तरह शामिल किया,
कि अब दुनिया हमें दो नहीं,
सिर्फ 'एक' कहती है...
अर्धनारीश्वर।
यही तो प्रेम है—
जहाँ 'मैं' और 'तुम' का शोर नहीं,
बस 'हम' का सन्नाटा है।
आसान था एक 'योगी' से प्रेम करना?
वो, जो अपनी ही धुन में,
संसार से कटा हुआ,
बर्फ की चट्टानों पर बैठा था...
आँखें मूंदे, दुनिया से बेखबर।
सबने कहा— "वो वैरागी है,
उसके पास देने को कुछ नहीं...
न महल, न गहने, न रेशमी वस्त्र।
सिर्फ भस्म है, और श्मशान की राख।"
मगर मैंने...
मैंने उस राख में अपना 'सिंदूर' देखा।
जब दुनिया उसके गले के नाग देखकर डरती थी,
मुझे उस खौफनाक रूप में भी,
एक 'भोलापन' नज़र आता था।
मैंने इंतेज़ार किया...
सिर्फ एक जनम नहीं,
सदियों तक इंतेज़ार किया,
कि कब वो अपनी समाधि तोड़ेगा,
और कब मेरी तपस्या उसकी वैराग्य को पिघलाएगी।
और जब उसने आँखें खोलीं...
तो उसने मुझे कोई सिंहासन नहीं दिया,
उसने मुझे वो दिया, जो आज तक किसी प्रेमी ने नहीं दिया।
उसने मुझे अपना 'आधा शरीर' दे दिया।
उसने मुझे अपने वजूद में इस तरह शामिल किया,
कि अब दुनिया हमें दो नहीं,
सिर्फ 'एक' कहती है...
अर्धनारीश्वर।
यही तो प्रेम है—
जहाँ 'मैं' और 'तुम' का शोर नहीं,
बस 'हम' का सन्नाटा है।
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