Ghazal

वैरागी की प्रेम-कथा

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​तुम्हें क्या लगता है,
आसान था एक 'योगी' से प्रेम करना?
​वो, जो अपनी ही धुन में,
संसार से कटा हुआ,
बर्फ की चट्टानों पर बैठा था...
आँखें मूंदे, दुनिया से बेखबर।
​सबने कहा— "वो वैरागी है,
उसके पास देने को कुछ नहीं...
न महल, न गहने, न रेशमी वस्त्र।
सिर्फ भस्म है, और श्मशान की राख।"
​मगर मैंने...
मैंने उस राख में अपना 'सिंदूर' देखा।
​जब दुनिया उसके गले के नाग देखकर डरती थी,
मुझे उस खौफनाक रूप में भी,
एक 'भोलापन' नज़र आता था।
​मैंने इंतेज़ार किया...
सिर्फ एक जनम नहीं,
सदियों तक इंतेज़ार किया,
कि कब वो अपनी समाधि तोड़ेगा,
और कब मेरी तपस्या उसकी वैराग्य को पिघलाएगी।
​और जब उसने आँखें खोलीं...
तो उसने मुझे कोई सिंहासन नहीं दिया,
उसने मुझे वो दिया, जो आज तक किसी प्रेमी ने नहीं दिया।
​उसने मुझे अपना 'आधा शरीर' दे दिया।
उसने मुझे अपने वजूद में इस तरह शामिल किया,
कि अब दुनिया हमें दो नहीं,
सिर्फ 'एक' कहती है...
अर्धनारीश्वर।
​यही तो प्रेम है—
जहाँ 'मैं' और 'तुम' का शोर नहीं,
बस 'हम' का सन्नाटा है।

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