Ghazal
शायरी की दुकान नहीं होती
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December 17, 2025
लफ़्ज़ों को जोड़ना तो बस एक हुनर है दुनिया का,
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों में आग भरने को,
हर किसी के मुँह में ऐसी तासीर-ए-ज़ुबान नहीं होती।
ये वो दौलत है जो विरासत में भी नहीं मिलती,
शायर पैदा होते हैं, ये चीज़ कोई सामान नहीं होती।
वो जो वाह-वाह करते हैं, उन्हें क्या खबर मेरे ज़ख्मों की,
बर्बाद हुए बिना, ग़ज़ल कभी आलीशान नहीं होती।
ईंट-पत्थरों से तो बना लेते हैं लोग घर अपना,
मगर दर्द के बिना, दिल में शायरी की पहचान नहीं होती।
जिसे चुनता है खुदा सिर्फ़ तड़पने के लिए ज़िगर,
ये वो बदनसीबी है, जो हर किसी पे मेहरबान नहीं होती।
मगर याद रखना, एहसास की कोई दुकान नहीं होती।
कलेजा चाहिए होता है लफ़्ज़ों में आग भरने को,
हर किसी के मुँह में ऐसी तासीर-ए-ज़ुबान नहीं होती।
ये वो दौलत है जो विरासत में भी नहीं मिलती,
शायर पैदा होते हैं, ये चीज़ कोई सामान नहीं होती।
वो जो वाह-वाह करते हैं, उन्हें क्या खबर मेरे ज़ख्मों की,
बर्बाद हुए बिना, ग़ज़ल कभी आलीशान नहीं होती।
ईंट-पत्थरों से तो बना लेते हैं लोग घर अपना,
मगर दर्द के बिना, दिल में शायरी की पहचान नहीं होती।
जिसे चुनता है खुदा सिर्फ़ तड़पने के लिए ज़िगर,
ये वो बदनसीबी है, जो हर किसी पे मेहरबान नहीं होती।
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