Shayari

सिगरेट के धुएँ का अक्स

19 views December 12, 2025
वो जा चुकी है, मैं सब कुछ फ़ना कर रहा हूँ,
मैं जल रहा हूँ और सबको धुआँ' कर रहा हूँ।

ये राख 'बिखरी' नहीं है, ये 'क़िस्सा' है मेरा,
मैं अपनी 'उम्र' का 'हासिल' 'बयाँ' कर रहा हूँ।

जो 'साँस' 'अंदर' है, 'वो' भी 'उसी' की 'अमानत' थी,
मैं 'फूँक' कर 'उसे' 'बाहर' 'रिहा' कर रहा हूँ।

'पता' है 'उम्र' 'घटा' रहा हूँ 'मैं' 'अपनी',
मैं 'उसके' 'बिन' 'जी' के 'वैसे' भी 'क्या' कर रहा

'बना' के 'छल्ला' 'उसे' 'देखता' हूँ 'कुछ' 'देर',
मैं 'एक' 'वहम' पे 'दिल' को 'फ़िदा' कर रहा हूँ।

वो 'होंठ' 'जलते' हैं 'मेरे' 'हर एक' 'कश' के 'साथ',
मैं 'उसके' 'लम्स' का 'शायद' जायाँ' कर रहा हूँ।
मै सिगरेट को धुंआ कर रहा हूँ,
मै खुद को रिहा कर रहा हूँ ।

More from Shayari

जो किए ही नहीं कभी मैंने
वो भी वादे निभा रहा हूँ मैं
मुझसे फिर बात कर रही है वो
फिर से बातों में आ रहा हूँ मैं
काँच का तोहफा न देना कभी, रूठ कर लोग 'तोड़' दिया करते हैं,
जो बहुत अच्छे हों, उन्हें अक्सर लोग 'छोड़' दिया करते हैं।
मुझे तेरा साथ ज़िन्दगी भर नहीं चाहिए,
बल्कि जब तक तू साथ है, तब तक ज़िन्दगी चाहिए।