Ghazal

सौदा-ए-ज़िंदगी

20 views December 12, 2025
इक उम्र गुज़ार दी हमने, इक नई उम्र पाने में,
अब कोसते हैं उसी वक़्त को, जो गंवाया ज़माने में।
कल के सुकून की ख़ातिर, हमने आज को गिरवी रख दिया,
पूरी जवानी फूँक दी, बुढ़ापे का बिस्तर सजाने में।

सोचा था दौड़ कर मंज़िल पे पहुँचेंगे, तो साँस लेंगे,
मगर साँसें ही फूल गईं, मंज़िल तक आने में।

घर तो पक्का बना लिया, मगर रिश्ते कच्चे रह गए,
हमनें ईंटें तो जोड़ लीं, मगर देर कर दी घर बसाने में।

जिस 'कल' की फ़िक्र में, हम ख़ुद को मारते रहे ता-उम्र,
वो 'कल' गुज़र गया, आज का मातम मनाने में।

ज़िगर शायर ने जीत ली दुनिया, मगर ज़िंदगी हार गया,
सब कुछ तो लुटा दिया, बस कुछ सिक्के कमाने में।

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