Ghazal
ससुराल का जाड़ा
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December 12, 2025
वहाँ आलस था, यहाँ फ़र्ज़ निभाना पड़ता है,
ये सर्दी हो कि गर्मी, रोज़ नहाना पड़ता है।
रज़ाई छोड़ के मायके में कौन उठता था,
यहाँ सासू जी से पहले जाग जाना पड़ता है।
पहन के सूट पे मैचिंग का शॉल लेती हो,
पुराना स्वेटर अब तुमको छुपाना पड़ता है।
फ़रमाइश करती थी चाय की जो बैठे बैठे,
यहाँ सबके लिए खुद ही बनाना पड़ता है।
हमें मालूम है दीदी वहाँ पे तुमको,
ये सर्दी का सितम कैसे उठाना पड़ता है।
रोज नहाना पड़ता है, रोज नहाना पड़ता है,
ये सर्दी हो कि गर्मी, रोज़ नहाना पड़ता है।
रज़ाई छोड़ के मायके में कौन उठता था,
यहाँ सासू जी से पहले जाग जाना पड़ता है।
पहन के सूट पे मैचिंग का शॉल लेती हो,
पुराना स्वेटर अब तुमको छुपाना पड़ता है।
फ़रमाइश करती थी चाय की जो बैठे बैठे,
यहाँ सबके लिए खुद ही बनाना पड़ता है।
हमें मालूम है दीदी वहाँ पे तुमको,
ये सर्दी का सितम कैसे उठाना पड़ता है।
रोज नहाना पड़ता है, रोज नहाना पड़ता है,
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