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Explore our collection of 82 beautiful poems
Ghazal
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इंसानियत का आसरा
किसी के ज़ख़्म की कोई दवा होना चाहिए,
बुरे वक़्तों में कोई आसरा होना चाहिए।
ये जो इंसान हैं, टूटे हुए हैं अंदर से,
इन्हें छूने को लहजा नरम होना चाहिए।
जो रोता है, उसे चुप से रुला देना ही बस,
...
बुरे वक़्तों में कोई आसरा होना चाहिए।
ये जो इंसान हैं, टूटे हुए हैं अंदर से,
इन्हें छूने को लहजा नरम होना चाहिए।
जो रोता है, उसे चुप से रुला देना ही बस,
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Ghazal
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बाज़ार
यहाँ 'ज़मीर' भी 'बाज़ार' में सरे-आम बिकता है,
वो 'सच' क्या बोलेगा, जिसका 'ईमान' बिकता है।
तू 'मंदिर-मस्जिद' में 'रब' को ढूँढता है 'नादान',
वहाँ तो 'दर्शन' का 'पैकेट' भी 'ऊँचे दाम' बिकता है।
'ग...
वो 'सच' क्या बोलेगा, जिसका 'ईमान' बिकता है।
तू 'मंदिर-मस्जिद' में 'रब' को ढूँढता है 'नादान',
वहाँ तो 'दर्शन' का 'पैकेट' भी 'ऊँचे दाम' बिकता है।
'ग...
Ghazal
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मरघट का सच
जो 'माल' गिनता था, उसका 'ख़याल' जल गया।
जो 'मैं' का 'जाल' बुना था, वो 'जंजाल' जल गया।
मरघट का सच
वो 'ऊँची ज़ात' की बातें, वो 'ऊँचा' सर उसका,
चिता की आँच लगी, सब 'कमाल' जल गया।
कोई 'दुकान' पे रो...
जो 'मैं' का 'जाल' बुना था, वो 'जंजाल' जल गया।
मरघट का सच
वो 'ऊँची ज़ात' की बातें, वो 'ऊँचा' सर उसका,
चिता की आँच लगी, सब 'कमाल' जल गया।
कोई 'दुकान' पे रो...
Ghazal
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मरघट का पाखंड
जो घर पे फ़र्ज़ न अपना निभाने निकले,
वो झूठे आँसू नदी में बहाने निकले
ज़मीन बाँट चुके जो अभी से आपस में,
वही चिता पे हैं 'रिश्ते' जताने निकले।
कभी जो पूछ न पाए थे 'पानी' की क़ीमत,
वो राख पर 'घ...
वो झूठे आँसू नदी में बहाने निकले
ज़मीन बाँट चुके जो अभी से आपस में,
वही चिता पे हैं 'रिश्ते' जताने निकले।
कभी जो पूछ न पाए थे 'पानी' की क़ीमत,
वो राख पर 'घ...
Ghazal
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आदत
चेहरे पे चेहरा हर घड़ी चढ़ाने की आदत है।
दुनिया को झूठे ख़्वाब ही दिखाने की आदत है।
जब काम हो तो पास वो आ जाने की आदत है।
मक़सद हुआ पूरा, तो कतराने की आदत है।
महफ़िल में ऊँची हिकमतें सुनाने की...
दुनिया को झूठे ख़्वाब ही दिखाने की आदत है।
जब काम हो तो पास वो आ जाने की आदत है।
मक़सद हुआ पूरा, तो कतराने की आदत है।
महफ़िल में ऊँची हिकमतें सुनाने की...
Ghazal
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मरण
रोज साँसां की किस्तां नै भरता रहूँ,
इस जिन्दगी का कर्जा उतरता कोन्या।
घुट-घुट कै मर जाऊँ तो ठीक सै सबनै,
पर सीधी मौत पै घर राजी होता कोन्या।
पर तो दे दिए राम नै, उड़ण का हुनर भी दिया,
पर इस ग...
इस जिन्दगी का कर्जा उतरता कोन्या।
घुट-घुट कै मर जाऊँ तो ठीक सै सबनै,
पर सीधी मौत पै घर राजी होता कोन्या।
पर तो दे दिए राम नै, उड़ण का हुनर भी दिया,
पर इस ग...
Shayari
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दिन ढला, दीप जला
दिन का सफ़र सिमट कर अब ढल रहा है,
घर के अँधेरे कोने में इक दीप जल रहा है।
रिश्तों पे जम गई थी जो बर्फ़ पिछली शब,
देखो, चिराग़ की गर्मी से वो भी पिघल रहा है।
बाहर का शोरगुल तो बस कुछ पलों का मेहमान...
घर के अँधेरे कोने में इक दीप जल रहा है।
रिश्तों पे जम गई थी जो बर्फ़ पिछली शब,
देखो, चिराग़ की गर्मी से वो भी पिघल रहा है।
बाहर का शोरगुल तो बस कुछ पलों का मेहमान...
Nazm
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अब आए हो?
तो... आ ही गए।
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमदर्दी? या बस मेरे जले हुए ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने का नया तरीका ढूँढ लाए हो?
अरे,...
मेरी कामयाबी की गंध तुम्हें खींच ही लाई, जैसे लाश की महक गिद्धों को ले आती है।
क्या चाहिए?
हिस्सा? हमदर्दी? या बस मेरे जले हुए ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने का नया तरीका ढूँढ लाए हो?
अरे,...
Ghazal
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मैं इसलिए किसी को नहीं चाहता...
यहाँ हर शख़्स काग़ज़ का खिलौना चाहता है,
मैं दिल देकर यूँ क़ीमत चुकाना नहीं चाहता।
लोग पढ़ते हैं चेहरे को मतलब निकालने तक,
मैं ऐसी कोई भी महफ़िल सजाना नहीं चाहता।
वो कहते हैं कि हमदर्द हैं, पर...
मैं दिल देकर यूँ क़ीमत चुकाना नहीं चाहता।
लोग पढ़ते हैं चेहरे को मतलब निकालने तक,
मैं ऐसी कोई भी महफ़िल सजाना नहीं चाहता।
वो कहते हैं कि हमदर्द हैं, पर...
Shayari
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पीछे है
हर कोई दौड़ रहा है, एक सराब के पीछे है
असली चेहरा कहाँ है, सब नक़ाब के पीछे है
रूह की सादगी को यहाँ कौन पूछता है
दुनिया तो बस जिस्म की आब-ओ-ताब के पीछे है
न दिन में चैन है किसी को, न रातों में स...
असली चेहरा कहाँ है, सब नक़ाब के पीछे है
रूह की सादगी को यहाँ कौन पूछता है
दुनिया तो बस जिस्म की आब-ओ-ताब के पीछे है
न दिन में चैन है किसी को, न रातों में स...
Shayari
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ढूंढता हूँ
इस ज़िन्दगी के सफ़र में अपना निशान ढूंढता हूँ
मैं भीड़ में खो गया हूँ, एक इंसान ढूंढता हूँ
ज़मीन की तल्ख़ियों से दिल बहुत घबरा गया है
परिंदों की तरह अब खुला आसमान ढूंढता हूँ
यहाँ हर शख़्स की क़ी...
मैं भीड़ में खो गया हूँ, एक इंसान ढूंढता हूँ
ज़मीन की तल्ख़ियों से दिल बहुत घबरा गया है
परिंदों की तरह अब खुला आसमान ढूंढता हूँ
यहाँ हर शख़्स की क़ी...
Ghazal
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हाँ मैं अहंकारी हूँ।
जब लड़ रहा था मैं अकेले ज़िन्दगी के तूफ़ानों से,
जब घिरा हुआ था मैं मतलबपरस्त इंसानों से,
मैं अपने ही ग़मों का एक अकेला व्यापारी हूँ,
अगर इसे कहते हो खुद्दारी, तो हाँ मैं अहंकारी हूँ।
तब कहाँ थे...
जब घिरा हुआ था मैं मतलबपरस्त इंसानों से,
मैं अपने ही ग़मों का एक अकेला व्यापारी हूँ,
अगर इसे कहते हो खुद्दारी, तो हाँ मैं अहंकारी हूँ।
तब कहाँ थे...